छोटे बच्चों में कैसे जन्म लेता है थैलेसेमिया का विषाणु और यह क्या असर करता है

थैलेसेमिया

नमस्कार दोस्तों सेहत सुंदर में आपलोगों का फिर से एक बार स्वागत है। आज हम अपने इस आर्टिकल में आपलोगों को थैलेसेमिया से जुड़ी कुछ जरूरी बातें बताने जा रहे हैं। आर्टिकल ज्यादा बड़ा न हो जाए और आपको उबन न हो इसलिए इस पूरी जानकारी को कई भागों में प्रकाशित किया जा रहा है। तो चलिए शुरू करते हैं।

दोस्तों अपने पिछले आर्टिकल में हमने आपको यह बताया है कि शादी से पहले थैलेसेमिया टेस्ट करवाना क्यों बेहद जरूरी होता है और इस टेस्ट रिजल्ट की व्याख्या भी बताई जा चुकी है। इसलिए हम अपने इस आर्टिकल में आपलोगों को बताने जा रहे हैं कि आखिर यह थैलेसेमिया होता क्या है। तो चलिए शुरू करते हैं।

दोस्तों थैलेसीमिया अक्सर एक आनुवांशिक बीमारी होती है। इस बीमारी के होने का प्रमुख कारण रक्तदोष होता है। यह बीमारी अधिकतर छोटे बच्चों को होती है और अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए तो उनकी मृत्यु भी हो सकती है। चलिए शुरुआत से समझाते हैं आपको।

दरअसल हर व्यक्ति के अंदर जिस तरह ट्यूबर्कुलोसिस और जौंडिस मौजूद रहता है, ठीक उसी तरह थैलेसीमिया के वाहक भी मौजूद होते हैं। बस फर्क यह है कि किसी में यह सकारात्मक होता है और किसी में नकारात्मक। अगर नकारात्मक और नकारात्मक जोड़ा या सकारात्मक और नकारात्मक जोड़ा शारीरिक संबंध बनाता है तो उसकी संतान में किसी भी तरह के थैलेसीमिया के विषाणु नहीं जन्म लेते हैं। लेकिन अगर संबंध बनाने वाले दोनों जोड़ों में सकारात्मक वाहक मौजूद हैं तो उनकी संतानों में थैलेसीमिया के विषाणु का जन्म होता है। अब हम आपको यह बताते हैं कि यह विषाणु शरीर में करता क्या है, धैर्य से पढ़ें।

एक स्वस्थ मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं अर्थात रेड ब्लड सेल की संख्या लगभग 48 से 50 लाख प्रति घन मिलीलीटर होती है। इनका निर्माण निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होता है और इनका जीवन काल 120 दिनों तक का होता है। यह फिर से बनते और नस्थ होते रहते हैं। यह लाल रक्त कोशिकाएँ हमारे शरीर में – ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड का परिवहन करती हैं। इनका रंग लाल होने का प्रमुख कारण शरीर में मौजूद हीमोग्लोबीन है। हीमोग्लोबीन ऑक्सीजन के साथ मिलकर एक अस्थाई यौगिक ऑक्सीहीमोग्लोबीन का निर्माण करता है। यह ऑक्सीहीमोग्लोबीन ही लाल रक्त कोशिकाओं के माध्यम से फेफड़े से होते हुए पूरे शरीर में दौड़ता रहता है और हमें जीवित रखता है। लेकिन थैलेसीमिया के विषाणु इन लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करते रहते हैं और इनका जीवन काल 120 दिनों की जगह घटकर 20-30 दिनों के आस-पास हो जाता है। इससे रोगी के शरीर में खून की कमी होने लगती है। इस रोग से पीड़ित बच्चों में इसके लक्षण जन्म से लेकर चार या छह महीने में ही नजर आने लगते हैं। उनके नाखूनों में पीलापन आने लगता है और लिवर की लंबाई बढ्ने लगती है। इससे बच्चे का विकास बिलकुल रुक जाता है। दोस्तों इस आर्टिकल में बस इतना ही अपने अगले आर्टिकल में हम आपको बताएँगे कि इस बीमारी से बचने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए।

छोटे बच्चों में होने वाले थैलेसेमिया रोग का इलाज आपकी सावधानी पर निर्भर है

शादी से पहले की आपकी एक गलती के कारण होता है आने वाली संतान को थैलेसेमिया

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